Saturday, December 31, 2022

OMG! दुनिया के 4 ऐसे रोचक तथ्य, जिनके बारे में जानकर ही लोग हो जाते हैं हैरान!

 दुनिया में ऐसी बहुत सारी जगहें हैं, जिनके बारे में बहुत कम ही लोगों को जानकारी है. इसी तरह कुछ ऐसे रोचक तथ्य भी हैं, जिनके बारे में भी बहुत कम ही लोग जानते हैं और जानने के बाद हैरान हुए बिना नहीं रहते. आपने मोटर रेस तो देखी होगी, लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया की पहली मोटर रेस कब हुई थी और उसका विजेता कौन था? शायद नहीं जानते होंगे. तो चलिए आज हम आपको दुनिया के कुछ ऐसे ही रोचक तथ्यों के बारे में बताने जा रहे हैं, जो आपको हैरान कर दें


दुनिया की पहली मोटर रेस 11 जून 1895 को हुई थी. आपको जानकर हैरानी होगी कि इस रेस में पहले नंबर पर आए प्रतिभागी को विजेता नहीं माना गया था, बल्कि तीसरे नंबर पर आए प्रतिभागी पॉल कोचलिन को विजेता घोषित किया गया था.

दुनिया का सबसे लोकप्रिय कार्टून किरदार डोनाल्ड डक तो आपने देखी ही होगी, लेकिन शायद ही आप जानते होंगे कि शुरुआत में करीब 50 साल तक क्लारेंस नैश ने इस किरदार को अपनी आवाज दी थी. इसके बाद टोनी एन्सेल्मो को यह जिम्मेदारी दी गई, जो अब तक डोनाल्ड डक की आवाज बने हुए हैं.


होवरक्राफ्ट के बारे में शायद ही आप जानते होंगे कि यह एक ऐसा अनोखा वाहन है, जिसमें जमीन पर और पानी में चलने की क्षमता तो है ही, साथ ही यह कीचड़ भरे जगह पर और यहां तक कि बर्फीली सतह पर भी आसानी से चल सकता है. ब्रिटेन के इंजीनियर सर क्रिस्टोफर क्रोकेरेल ने इसका आविष्कार किया था.


आपने व्हेल मछली तो जरूर देखी होगी. इस विशालकाय मछली का वजन करीब 1400 किलो होता है, पर यह बात शायद ही आप जानते होंगे कि ब्लू व्हेल मछली के दिल का वजन ही एक आम इंसान के वजन से कहीं अधिक होता है. उसका दिल करीब 180 किलो का होता है.


Thursday, December 29, 2022

दुनिया के कुछ रोचक और हैरान करने वाले तथ्य, शायद ही जानते होंगे आप

 दुनिया में ऐसी कई चीजें हैं, जो रोचक होने के साथ-साथ हैरान भी करती हैं। जैसे कि शहद दुनिया का इकलौता ऐसा खाद्य पदार्थ है, जो कभी खराब नहीं होता है। यह हजारों साल तक सुरक्षित रहता है। कई बार खोज के दौरान मिस्र की प्राचीन कब्रों में से हजारों साल पुराना शहद वैज्ञानिकों को मिला है, जो अभी भी खराब नहीं हुआ है। आज हम आपको ऐसे ही कुछ रोचक और हैरान करने वाले तथ्य बताने जा रहे हैं, जिनके बारे में शायद ही आप जानते होंगे। 



आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि नोट कागज के बनते हैं, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि नोट कागज के नहीं बल्कि कपास के बनते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि कपास कागज की तुलना में अधिक मजबूत होते हैं और वो जल्दी फटते नहीं हैं।


मेघालय में एक नदी है 'उमंगोट नदी', जिसे भारत की सबसे साफ नदी कहा जाता है। यह नदी मावल्यान्नांग गांव के पास है, जिसे एशिया का सबसे स्वच्छ गांव कहा जाता है। गांव में करीब 300 घर हैं और सभी मिलकर इस नदी की साफ-सफाई करते हैं। सबसे खास बात ये है कि इस नदी में गंदगी फैलाने पर लोगों से 5000 रुपये तक का जुर्माना वसूला जाता है।


नामीबिया में एक ऐसी जगह है, जहां अटलांटिक महासागर यहां के वेस्ट कोस्ट रेगिस्तान से मिलता है। यह दुनिया का सबसे पुराना रेगिस्तान है, जो करीब साढ़े पांच करोड़ साल से भी ज्यादा पुराना है। खास बात ये है कि यहां दिखने वाले रेत के टीले पूरी दुनिया में सबसे बड़े हैं।

महाराष्ट्र का राजकीय पक्षी हरियल एक ऐसा पक्षी है, जो कभी धरती पर अपना पैर नहीं रखता। इन्हें ऊंचे-ऊंचे पेड़ वाले जंगल पसंद हैं। हरियल पक्षी अक्सर अपना घोंसला पीपल और बरगद के पेड़ पर बनाना पसंद करते हैं। ये सामाजिक प्राणी हैं और अधिकतर झुंड में ही पाए जाते हैं।


दुनियाभर में पीने के पानी की किल्लत कितनी ज्यादा है, ये तो जगजाहिर है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर वो कौन सा देश है, जहां दुनिया में सबसे ज्यादा पीने लायक पानी है? अगर नहीं, तो हम आपको बता दें कि इस देश का नाम है ब्राजील, जहां नवीकरणीय जल संसाधनों की उच्चतम मात्रा है, जो कुल 8,233 घन किलोमीटर है।




Wednesday, December 28, 2022

इन 18 तस्वीरों के ज़रिये जानिए कि दुनिया के इतिहास में क्या कुछ अतरंगी और रोचक हुआ है

 Historical Pictures: इतिहास के बारे में पढ़ना वाकई दिलचस्प होता है और जब इसकी तस्वीरें और फ़ैक्ट्स साथ में हो तो सोने पे सुहागा. वर्ल्ड हिस्ट्री की कुछ ऐसी ही मज़ेदार तस्वीरें हम आपके लिए लेकर आए हैं.इन फ़ोटोज़ से जुड़े फ़ैक्ट्स के बारे में जानकर आप हैरान और गदगद दोनों होंगे क्योंकि इन्हें जानने के बाद आप यही सोचेंगे उस ज़माने में भी क्या-क्या होता था. चलिए देर न करते हुए इस ऐतिहासिक तस्वीरों के रोमांच कर देने वाले सफ़र पर निकल पड़ते हैं.1. 1945 में WW2 ख़त्म होने के बाद पानी के जहाज़ से वापस वतन लौटते अमेरिकी  सैनिक. 


   
2. वारसॉ विद्रोह के बीच सुरक्षित बच निकली एक पोलिश लड़की.


3. 1964 में Beatles के शो के लिए स्कूल बंक करने वाला एक ग्रुप. 

4. 1913 में Union Blue और Confederate Gray के लोग संधी करते हुए. 











5. 1926 में जर्मनी में ट्रिपल डेकर बस चलती थी. 

6. 1940 के दशक में पोलियो के प्रकोप दौरान अमेरिका में रेडियो पर बच्चों को पढ़ाया जाता था. 


7. एरिज़ोना में मिला 225 मिलियन वर्ष पुराना Opal Tree Trunk. 

 

8. 1945 में युद्ध में बर्बाद क्षेत्र में बैठी एक जर्मन महिला.

Historical Pictures


9.. 1981 में एक शख़्स को आत्महत्या करने से बचाते बॉक्सर मोहम्मद अली. 


10. उत्तरी का एक कंट्री स्टोर. 


11. रोमानिया का ड्रैकुला का क़िला. 


12. अमेरिका की पहली करोड़पति महिला CJ Walker अपनी कार में सफ़र करते हुए. 


13. 2000 साल पहले Mount Vesuvius के विस्फ़ोट में दबकर मरे एक शख़्स का कंकाल. 


14. अमेरिकन एयरक्राफ़्ट कैरियर. 


15. अमेरिका में 1861 में हुए गृह युद्ध में गोली खाने के बाद 54 साल जीने वाले Jacob Miller.


16. 1900 के दशक का टिंडर. 


17. आर्कटिक महासागर में मिली 392 साल पुरानी ग्रीनलैंड शार्क. 


18. 2 अर्मेनियाई महिलाएं ओटोमन के खिलाफ़ लड़ने के लिए जाते हुए. 


इनमें से कौन-सी तस्वीर का इतिहास आपको सबसे रोचक लगा, कमेंट बॉक्स में बताना.

Sunday, December 25, 2022

जीवन परिचय : गौतम बुद्ध Biography : Gautama Buddha




गौतम बुद्ध (563 ईसा पूर्व–483 ईसा पूर्व) को महात्मा बुद्ध, भगवान बुद्ध, सिद्धार्थ व शाक्यमुनि नाम से भी जाना जाता है । वह श्रमण थे जिनकी शिक्षाओं पर बौद्ध धर्म का प्रचलन हुआ उनका जन्म लुंबिनी में क्षत्रिय शाक्य कुल के राजा शुद्धोधन के घर में हुआ था। उनकी माँ का नाम महामाया था जो कोलीय वंश से थीं, जिनका इनके जन्म के सात दिन बाद निधन हुआ, उनका पालन महारानी की छोटी सगी बहन महाप्रजापती गौतमी ने किया। सिद्धार्थ विवाहोपरांत एक मात्र प्रथम नवजात शिशु राहुल और धर्मपत्नी यशोधरा को त्यागकर संसार को जरा, मरण, दुखों से मुक्ति दिलाने के मार्ग एवं सत्य दिव्य ज्ञान की खोज में रात्रि में राजपाठ का मोह त्यागकर वन की ओर चले गए। वर्षों की कठोर साधना के पश्चात बोध गया (बिहार) में बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे सिद्धार्थ गौतम से भगवान बुद्ध बन गए।

जन्म तथा बाल्यकाल

उनका जन्म शाक्य गणराज्य की तत्कालीन राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी में हुआ था, जो नेपाल में है।लुम्बिनी वन नेपाल के तराई क्षेत्र में कपिलवस्तु और देवदह के बीच नौतनवा स्टेशन से 8 मील दूर पश्चिम में रुक्मिनदेई नामक स्थान के पास स्थित था। कपिलवस्तु की महारानी महामाया देवी के अपने नैहर देवदह जाते हुए रास्ते में प्रसव पीड़ा हुई और वहीं उन्होंने एक बालक को जन्म दिया। शिशु का नाम सिद्धार्थ रखा गया। गौतम गोत्र में जन्म लेने के कारण वे गौतम भी कहलाए। क्षत्रिय राजा शुद्धोधन उनके पिता थे। परंपरागत कथा के अनुसार सिद्धार्थ की माता का उनके जन्म के सात दिन बाद निधन हो गया था। उनका पालन पोषण उनकी मौसी और शुद्दोधन की दूसरी रानी महाप्रजावती (गौतमी) ने किया। शिशु का नाम सिद्धार्थ दिया गया, जिसका अर्थ है "वह जो सिद्धी प्राप्ति के लिए जन्मा हो"।

जन्म समारोह के दौरान, साधु द्रष्टा आसित ने अपने पहाड़ के निवास से घोषणा की- बच्चा या तो एक महान राजा या एक महान पवित्र पथ प्रदर्शक बनेगा। शुद्दोधन ने पांचवें दिन एक नामकरण समारोह आयोजित किया और आठ ब्राह्मण विद्वानों को भविष्य पढ़ने के लिए आमंत्रित किया। सभी ने एक सी दोहरी भविष्यवाणी की, कि बच्चा या तो एक महान राजा या एक महान पवित्र आदमी बनेगा। दक्षिण मध्य नेपाल में स्थित लुंबिनी में उस स्थल पर महाराज अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व बुद्ध के जन्म की स्मृति में एक स्तम्भ बनवाया था। बुद्ध का जन्म दिवस व्यापक रूप से कई देशों में मनाया जाता है।

सिद्धार्थ का मन बचपन से ही करुणा और दया का स्रोत था। इसका परिचय उनके आरंभिक जीवन की अनेक घटनाओं से पता चलता है। घुड़दौड़ में जब घोड़े दौड़ते और उनके मुँह से झाग निकलने लगता तो सिद्धार्थ उन्हें थका जानकर वहीं रोक देता और जीती हुई बाजी हार जाता। खेल में भी सिद्धार्थ को खुद हार जाना पसंद था क्योंकि किसी को हराना और किसी का दुःखी होना उससे नहीं देखा जाता था। सिद्धार्थ ने चचेरे भाई देवदत्त द्वारा तीर से घायल किए गए हंस की सहायता की और उसके प्राणों की रक्षा की।

शिक्षा एवं विवाह

सिद्धार्थ ने राजकाज और युद्ध-विद्या की भी शिक्षा ली। कुश्ती, घुड़दौड़, तीर-कमान, रथ हाँकने में कोई उसकी बराबरी नहीं कर पाता। सोलह वर्ष की उम्र में सिद्धार्थ का कन्या यशोधरा के साथ विवाह हुआ। पिता द्वारा ऋतुओं के अनुरूप बनाए गए वैभवशाली और समस्त भोगों से युक्त महल में वे यशोधरा के साथ रहने लगे जहाँ उनके पुत्र राहुल का जन्म हुआ। लेकिन विवाह के बाद उनका मन वैराग्य में चला और सम्यक सुख-शांति के लिए उन्होंने आपने परिवार का त्याग कर दिया।

विरक्ति

राजा शुद्धोधन ने सिद्धार्थ के लिए भोग-विलास का भरपूर प्रबंध कर दिया। तीन ऋतुओं के लायक तीन सुंदर महल बनवा दिए। वहाँ पर नाच-गान और मनोरंजन की सारी सामग्री जुटा दी गई। दास-दासी उसकी सेवा में रख दिए गए। पर ये सब चीजें सिद्धार्थ को संसार में बाँधकर नहीं रख सकीं। वसंत ऋतु में एक दिन सिद्धार्थ बगीचे की सैर पर निकले। उन्हें सड़क पर एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया। उसके दाँत टूट गए थे, बाल पक गए थे, शरीर टेढ़ा हो गया था। हाथ में लाठी पकड़े धीरे-धीरे काँपता हुआ वह सड़क पर चल रहा था। दूसरी बार कुमार जब बगीचे की सैर को निकला, तो उसकी आँखों के आगे एक रोगी आ गया। उसकी साँस तेजी से चल रही थी। कंधे ढीले पड़ गए थे। बाँहें सूख गई थीं। पेट फूल गया था। चेहरा पीला पड़ गया था। दूसरे के सहारे वह बड़ी मुश्किल से चल पा रहा था। तीसरी बार सिद्धार्थ को एक अर्थी मिली। चार आदमी उसे उठाकर लिए जा रहे थे। पीछे-पीछे बहुत से लोग थे। कोई रो रहा था, कोई छाती पीट रहा था, कोई अपने बाल नोच रहा था। इन दृश्यों ने सिद्धार्थ को बहुत विचलित किया। उन्होंने सोचा कि ‘धिक्कार है जवानी को, जो जीवन को सोख लेती है। धिक्कार है स्वास्थ्य को, जो शरीर को नष्ट कर देता है। धिक्कार है जीवन को, जो इतनी जल्दी अपना अध्याय पूरा कर देता है। क्या बुढ़ापा, बीमारी और मौत सदा इसी तरह होती रहेगी सौम्य? चौथी बार कुमार बगीचे की सैर को निकला, तो उसे एक संन्यासी दिखाई पड़ा। संसार की सारी भावनाओं और कामनाओं से मुक्त प्रसन्नचित्त संन्यासी ने सिद्धार्थ को आकृष्ट किया।

महाभिनिष्क्रमण

सुंदर पत्नी यशोधरा, दुधमुँहे राहुल और कपिलवस्तु जैसे राज्य का मोह छोड़कर सिद्धार्थ तपस्या के लिए चल पड़े। वह राजगृह पहुँचे। वहाँ भिक्षा माँगी। सिद्धार्थ घूमते-घूमते आलार कालाम और उद्दक रामपुत्र के पास पहुँचे। उनसे योग-साधना सीखी। समाधि लगाना सीखा। पर उससे उसे संतोष नहीं हुआ। वह उरुवेला पहुँचे और वहाँ पर तरह-तरह से तपस्या करने लगे।

सिद्धार्थ ने पहले तो केवल तिल-चावल खाकर तपस्या शुरू की, बाद में कोई भी आहार लेना बंद कर दिया। शरीर सूखकर काँटा हो गया। छः साल बीत गए तपस्या करते हुए। सिद्धार्थ की तपस्या सफल नहीं हुई। शांति हेतु बुद्ध का मध्यम मार्ग : एक दिन कुछ स्त्रियाँ किसी नगर से लौटती हुई वहाँ से निकलीं, जहाँ सिद्धार्थ तपस्या कर रहा थे। उनका एक गीत सिद्धार्थ के कान में पड़ा- ‘वीणा के तारों को ढीला मत छोड़ दो। ढीला छोड़ देने से उनका सुरीला स्वर नहीं निकलेगा। पर तारों को इतना कसो भी मत कि वे टूट जाएँ।’ बात सिद्धार्थ को जँच गई। वह मान गये कि नियमित आहार-विहार से ही योग सिद्ध होता है। अति किसी बात की अच्छी नहीं। किसी भी प्राप्ति के लिए मध्यम मार्ग ही ठीक होता है ओर इसके लिए कठोर तपस्या करनी पड़ती है।

ज्ञान की प्राप्ति

बुद्ध के प्रथम गुरु आलार कलाम थे,जिनसे उन्होंने संन्यास काल में शिक्षा प्राप्त की । ३५ वर्ष की आयु में वैशाखी पूर्णिमा के दिन सिद्धार्थ पीपल वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ थे। बुद्ध ने बोधगया में निरंजना नदी के तट पर कठोर तपस्या की तथा सुजाता नामक लड़की के हाथों खीर खाकर उपवास तोड़ा। समीपवर्ती गाँव की एक स्त्री सुजाता को पुत्र हुआ।वह बेटे के लिए एक पीपल वृक्ष से मन्नत पूरी करने के लिए सोने के थाल में गाय के दूध की खीर भरकर पहुँची। सिद्धार्थ वहाँ बैठा ध्यान कर रहा था। उसे लगा कि वृक्षदेवता ही मानो पूजा लेने के लिए शरीर धरकर बैठे हैं। सुजाता ने बड़े आदर से सिद्धार्थ को खीर भेंट की और कहा- ‘जैसे मेरी मनोकामना पूरी हुई, उसी तरह आपकी भी हो।’ उसी रात को ध्यान लगाने पर सिद्धार्थ की साधना सफल हुई। उसे सच्चा बोध हुआ। तभी से सिद्धार्थ 'बुद्ध' कहलाए। जिस पीपल वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को बोध मिला वह बोधिवृक्ष कहलाया और गया का समीपवर्ती वह स्थान बोधगया।

धर्म-चक्र-प्रवर्तन

वे 80 वर्ष की उम्र तक अपने धर्म का संस्कृत के बजाय उस समय की सीधी सरल लोकभाषा पाली में प्रचार करते रहे। उनके सीधे सरल धर्म की लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी। चार सप्ताह तक बोधिवृक्ष के नीचे रहकर धर्म के स्वरूप का चिंतन करने के बाद बुद्ध धर्म का उपदेश करने निकल पड़े। आषाढ़ की पूर्णिमा को वे काशी के पास मृगदाव (वर्तमान में सारनाथ) पहुँचे। वहीं पर उन्होंने सर्वप्रथम धर्मोपदेश दिया और प्रथम पाँच मित्रों को अपना अनुयायी बनाया और फिर उन्हें धर्म प्रचार करने के लिये भेज दिया। महाप्रजापती गौतमी (बुद्ध की विमाता) को सर्वप्रथम बौद्ध संघ मे प्रवेश मिला। आनंद, बुद्ध का प्रिय शिष्य था। बुद्ध आनंद को ही संबोधित करके अपने उपदेश देते थे।

महापरिनिर्वाण

पालि सिद्धांत के महापरिनिर्वाण सुत्त के अनुसार ८० वर्ष की आयु में बुद्ध ने घोषणा की कि वे जल्द ही परिनिर्वाण के लिए रवाना होंगे। बुद्ध ने अपना आखिरी भोजन, जिसे उन्होंने कुन्डा नामक एक लोहार से एक भेंट के रूप में प्राप्त किया था, ग्रहण लिया जिसके कारण वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गये। बुद्ध ने अपने शिष्य आनंद को निर्देश दिया कि वह कुन्डा को समझाए कि उसने कोई गलती नहीं की है। उन्होने कहा कि यह भोजन अतुल्य है।

उपदेश

भगवान बुद्ध ने लोगों को मध्यम मार्ग का उपदेश किया। उन्होंने दुःख, उसके कारण और निवारण के लिए अष्टांगिक मार्ग सुझाया। उन्होंने अहिंसा पर बहुत जोर दिया है। उन्होंने यज्ञ और पशु-बलि की निंदा की। बुद्ध के उपदेशों का सार इस प्रकार है -

आर्यसत्य चार हैं-
(1) दुःख : संसार में दुःख है,
(2) समुदय : दुःख के कारण हैं,
(3) निरोध : दुःख के निवारण हैं,
(4) मार्ग : निवारण के लिये अष्टांगिक मार्ग हैं।

आर्य अष्टांग मार्ग

बौद्ध धर्म के अनुसार, चौथे आर्य सत्य का आर्य अष्टांग मार्ग है - दुःख निरोध पाने का रास्ता। गौतम बुद्ध कहते थे कि चार आर्य सत्य की सत्यता का निश्चय करने के लिए इस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए :

सम्यक दृष्टि : चार आर्य सत्य में विश्वास करना
सम्यक संकल्प : मानसिक और नैतिक विकास की प्रतिज्ञा करना
सम्यक वाक : हानिकारक बातें और झूठ न बोलना
सम्यक कर्म : हानिकारक कर्म न करना
सम्यक जीविका : कोई भी स्पष्टतः या अस्पष्टतः हानिकारक व्यापार न करना
सम्यक प्रयास : अपने आप सुधरने की कोशिश करना
सम्यक स्मृति : स्पष्ट ज्ञान से देखने की मानसिक योग्यता पाने की कोशिश करना
सम्यक समाधि : निर्वाण पाना और स्वयं का गायब होना
कुछ लोग आर्य अष्टांग मार्ग को पथ की तरह समझते है, जिसमें आगे बढ़ने के लिए, पिछले के स्तर को पाना आवश्यक है। और लोगों को लगता है कि इस मार्ग के स्तर सब साथ-साथ पाए जाते है। मार्ग को तीन हिस्सों में वर्गीकृत किया जाता है : प्रज्ञा, शील और समाधि।

बौद्ध धर्म एवं संघ

बुद्ध के धर्म प्रचार से भिक्षुओं की संख्या बढ़ने लगी। बड़े-बड़े राजा-महाराजा भी उनके शिष्य बनने लगे। शुद्धोधन और राहुल ने भी बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। भिक्षुओं की संख्या बहुत बढ़ने पर बौद्ध संघ की स्थापना की गई। बाद में लोगों के आग्रह पर बुद्ध ने स्त्रियों को भी संघ में ले लेने के लिए अनुमति दे दी, यद्यपि इसे उन्होंने उतना अच्छा नहीं माना। भगवान बुद्ध ने ‘बहुजन हिताय’ लोककल्याण के लिए अपने धर्म का देश-विदेश में प्रचार करने के लिए भिक्षुओं को इधर-उधर भेजा। अशोक आदि सम्राटों ने भी विदेशों में बौद्ध धर्म के प्रचार में अपनी अहम्‌ भूमिका निभाई। मौर्यकाल तक आते-आते भारत से निकलकर बौद्ध धर्म चीन, जापान, कोरिया, मंगोलिया, बर्मा, थाईलैंड, हिंद चीन, श्रीलंका आदि में फैल चुका था। इन देशों में बौद्ध धर्म बहुसंख्यक धर्म है।

Friday, December 23, 2022

प्रथम इतिहासकार


 

काशी प्रसाद जायसवाल

काशी प्रसाद जायसवाल
काशी प्रसाद जायसवाल पर जारी डाक टिकट
पूरा नामकाशी प्रसाद जायसवाल
जन्म27 नवम्बर1881
जन्म भूमिमिर्जापुरउत्तर प्रदेश
मृत्यु4 अगस्त1937
कर्म भूमिभारत
कर्म-क्षेत्रभारतीय इतिहास तथा पुरातत्त्व
मुख्य रचनाएँ'हिन्दू पॉलिसी', 'एन इंपीरियल हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया', 'ए क्रोनोलॉजी एण्ड हिस्ट्री ऑफ़ नेपाल', 'अंधकार युगीन भारत'।
विद्यालय'लंदन मिशन स्कूल', मिर्जापुर; 'ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी'।
प्रसिद्धिइतिहासकार
विशेष योगदानडॉ. राजेन्द्र प्रसाद के सहयोग से काशी प्रसाद जायसवाल ने 'इतिहास परिषद' की स्थापना की थी।
नागरिकताभारतीय
अन्य जानकारीकाशी प्रसाद जी आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के समकालीन थे। दोनों कभी सहपाठी और मित्र भी रहे थे, किन्तु बाद में दोनों में किंचिद कारणवश अमैत्री पनप गयी थी।
इन्हें भी देखेंकवि सूचीसाहित्यकार सूची

काशी प्रसाद जायसवाल (अंग्रेज़ीKashi Prasad Jayaswal ; जन्म- 27 नवम्बर1881मिर्जापुरउत्तर प्रदेश; मृत्यु- 4 अगस्त1937भारत के प्रसिद्ध इतिहासकार एवं साहित्यकार थे। ये इतिहास तथा पुरातत्त्व के अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान् थे। काशी प्रसाद जायसवाल 'काशी नागरी प्रचारिणी सभा' के उपमंत्री भी बने थे। इन्होंने 'बिहार रिसर्च जनरल' तथा 'पाटलीपुत्र' नामक पत्रों का सम्पादन भी किया था। 'पटना संग्रहालय' की स्थापना में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान था। इतिहास और मुद्रा विषयक अनेक सम्मेलनों की अध्यक्षता काशी प्रसाद जी ने की थी।

जन्म तथा शिक्षा

काशी प्रसाद जायसवाल का जन्म 27 नवम्बर, 1881 ई. में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में एक धनी व्यापारी परिवार में हुआ था। उन्होंने मिर्जापुर के 'लंदन मिशन स्कूल' से प्रवेश की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। इसके उपरान्त उच्च शिक्षा के लिये वे 'ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी' चले गये. जहाँ से इतिहास में एम. ए. किया। काशी प्रसाद जायसवाल ने 'बार' के लिये परीक्षा में भी सफलता प्राप्त की।

व्यावसायिक शुरुआत

भारत लौटने पर काशी प्रसाद जायसवाल ने 'कोलकाता विश्वविद्यालय' में प्रवक्ता बनने की कोशिश की, किन्तु राजनैतिक आन्दोलन में भाग लेने के कारण उन्हें नियुक्ति नहीं मिली। अन्तत: उन्होंने वकालत करने का निश्चय किया और सन 1911 में कोलकाता में वकालत आरम्भ की। कुछ वर्ष बाद 1914 में वे 'पटना उच्च न्यायालय' में आ गये और फिर यहीं पर वकालत करने लगे।

लेखन कार्य

वे 'काशी नागरी प्रचारिणी सभा' के उपमंत्री भी बनाये गए थे। काशी प्रसाद जायसवाल के शोधपरक लेख 'कौशाम्बी', 'लॉर्ड कर्ज़न की वक्तृता' और 'बक्सर' आदि लेख 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' में छपे। इनके द्वारा लिखित प्रमुख ग्रन्थ निम्नलिखित हैं-

  1. हिन्दू पॉलिसी
  2. एन इंपीरियल हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया
  3. ए क्रोनोलॉजी एण्ड हिस्ट्री ऑफ़ नेपाल
  4. अंधकार युगीन भारत

शुक्लजी के समकालीन

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के 'सरस्वती' का सम्पादक बनते ही सन 1903 में काशी प्रसाद जायसवाल के चार लेख, एक कविता और 'उपन्यास' नाम से एक सचित्र व्यंग्य सरस्वती में छपे। काशी प्रसाद जी आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के समकालीन थे। दोनों कभी सहपाठी और मित्र भी रहे थे, किन्तु बाद में दोनों में किंचिद कारणवश अमैत्री पनप गयी थी।

योगदान

निधन

भारत के इस प्रसिद्ध इतिहासकार का निधन 4 अगस्त1937 को हुआ।


डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम(डॉक्टर अबुल पाकिर जेनुलाबदीन अब्दुल कलाम)

1.परिचय 

2. डॉ कलाम का बचपन

3. डॉ कलाम की प्रारंभिक शिक्षा

4. वैमानिकी इंजीनियर बन करियर की हुई शुरुआत

5. डॉ कलाम के जीवन में मील के पत्थर

6. भारत के 11वें राष्ट्रपति चुने गए

7.सर्वधर्म समभाव के प्रतीक थे

8. कलाम द्वारा रचित पुस्तकें

9. पुरस्कार एवं सम्मान

10. डॉ कलाम का निधन

परिचय

भारत रत्न डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम हमारे देश के प्रख्यात वैज्ञानिक हैं जो भारत गणराज्य के राष्ट्रपति रह चुके हैं। उनका पूरा नाम है अवुल पकीर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम। वे भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति रहे हैं। वे एक गैरराजनीतिक व्यक्ति रहे हैं फिर भी विज्ञान की दुनिया में चमत्कारिक प्रदर्शन के कारण इतने लोकप्रिय रहे कि देश ने उन्हें सिर माथे पर उठा लिया तथा सर्वोच्च पद पर आसीन कर दिया। एक वैज्ञानिक का राष्ट्रपति पद पर पहुंचना पूरे विज्ञान जगत के लिए सम्मान तथा प्रतिष्ठा की बात थी। कहते हैं कि जो व्यक्ति किसी क्षेत्र विशेष में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता है, उसके लिए दूसरे क्षेत्रों में भी सब कुछ आसान और सहज हो जाता है। डॉ. कलाम इस बात को चरितार्थ करते हैं। भारत को अंतरिक्ष में पहुंचाने तथा मिसाइल क्षमता प्रदान करने का श्रेय डॉ. कलाम को जाता है। उनके द्वारा सफलतापूर्वक विकसित अग्नि और पृथ्वी जैसी बैलिस्टिक मिसाइलों ने राष्ट्र की सुरक्षा को मजबूती प्रदान की है। डॉ. कलाम अविवाहित नागरिक हैं और इनकी जीवन-गाथा किसी रोचक उपन्यास के नायक की कहानी से कम नहीं है। चमत्कारिक प्रतिभा के धनी डॉ. कलाम का व्यक्तित्व इतना उन्नत है कि वह सभी धर्म, जाति एवं सम्प्रदायों के व्यक्ति नज़र आते हैं। वे एक ऐसे सर्वस्वीकार्य भारतीय हैं जो देश के सभी वर्गों के लिए 'एक आदर्श' बन चुके हैं। विज्ञान की दुनिया से होकर देश का प्रथम नागरिक बनना कोई कपोल-कल्पना नहीं है बल्कि यह एक जीवित प्रणेता की सत्यकथा है।

इतने महत्तवपूर्ण व्यक्ति के बारे में कुछ भी कहना सरल नहीं है। वेशभूषा, बोलचाल के लहजे, अच्छे-खासे सरकारी आवास को छोड़कर हॉस्टल का सादगीपूर्ण जीवन, ये बातें उनके संपर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर एक सम्मोहक प्रभाव छोड़ती हैं। डॉ. कलाम एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, देश के विकास और युवा मस्तिष्कों को प्रज्ज्वलित करने में अपनी तल्लीनता के साथ साथ वे पर्यावरण की चिंता भी खूब करते हैं, साहित्य में रूचि रखते हैं, कविता लिखते हैं, वीणा बजाते हैं, तथा अध्यात्म से बहुत गहरे जुड़े हुए हैं। डॉ. कलाम में अपने काम के प्रति जबरदस्त दीवानगी है। उनके लिए कोई भी समय काम का समय होता है। वह अपना अधिकांश समय कार्यालय में बिताते हैं। देर शाम तक विभिन्न कार्यक्रमों में डॉ. कलाम की सक्रियता तथा स्फूर्ति काबिलेतारीफ है। ऊर्जा का ऐसा प्रवाह केवल गहरी प्रतिबद्धता तथा समर्पण से ही आ सकता है। डॉ. कलाम खानपान में पूर्णत: शाकाहारी व्यक्ति हैं। वे मदिरापान से बिलकुल परहेज करते हैं। उनका निजी जीवन अनुकरणीय है। डॉ. कलाम की याददाश्त बहुत तेज है। वे घटनाओं तथा बातों को याद रखते हैं। रेट

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम

परिचय

भारत रत्न डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम हमारे देश के प्रख्यात वैज्ञानिक हैं जो भारत गणराज्य के राष्ट्रपति रह चुके हैं। उनका पूरा नाम है अवुल पकीर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम। वे भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति रहे हैं। वे एक गैरराजनीतिक व्यक्ति रहे हैं फिर भी विज्ञान की दुनिया में चमत्कारिक प्रदर्शन के कारण इतने लोकप्रिय रहे कि देश ने उन्हें सिर माथे पर उठा लिया तथा सर्वोच्च पद पर आसीन कर दिया। एक वैज्ञानिक का राष्ट्रपति पद पर पहुंचना पूरे विज्ञान जगत के लिए सम्मान तथा प्रतिष्ठा की बात थी। कहते हैं कि जो व्यक्ति किसी क्षेत्र विशेष में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता है, उसके लिए दूसरे क्षेत्रों में भी सब कुछ आसान और सहज हो जाता है। डॉ. कलाम इस बात को चरितार्थ करते हैं। भारत को अंतरिक्ष में पहुंचाने तथा मिसाइल क्षमता प्रदान करने का श्रेय डॉ. कलाम को जाता है। उनके द्वारा सफलतापूर्वक विकसित अग्नि और पृथ्वी जैसी बैलिस्टिक मिसाइलों ने राष्ट्र की सुरक्षा को मजबूती प्रदान की है। डॉ. कलाम अविवाहित नागरिक हैं और इनकी जीवन-गाथा किसी रोचक उपन्यास के नायक की कहानी से कम नहीं है। चमत्कारिक प्रतिभा के धनी डॉ. कलाम का व्यक्तित्व इतना उन्नत है कि वह सभी धर्म, जाति एवं सम्प्रदायों के व्यक्ति नज़र आते हैं। वे एक ऐसे सर्वस्वीकार्य भारतीय हैं जो देश के सभी वर्गों के लिए 'एक आदर्श' बन चुके हैं। विज्ञान की दुनिया से होकर देश का प्रथम नागरिक बनना कोई कपोल-कल्पना नहीं है बल्कि यह एक जीवित प्रणेता की सत्यकथा है।

इतने महत्तवपूर्ण व्यक्ति के बारे में कुछ भी कहना सरल नहीं है। वेशभूषा, बोलचाल के लहजे, अच्छे-खासे सरकारी आवास को छोड़कर हॉस्टल का सादगीपूर्ण जीवन, ये बातें उनके संपर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर एक सम्मोहक प्रभाव छोड़ती हैं। डॉ. कलाम एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, देश के विकास और युवा मस्तिष्कों को प्रज्ज्वलित करने में अपनी तल्लीनता के साथ साथ वे पर्यावरण की चिंता भी खूब करते हैं, साहित्य में रूचि रखते हैं, कविता लिखते हैं, वीणा बजाते हैं, तथा अध्यात्म से बहुत गहरे जुड़े हुए हैं। डॉ. कलाम में अपने काम के प्रति जबरदस्त दीवानगी है। उनके लिए कोई भी समय काम का समय होता है। वह अपना अधिकांश समय कार्यालय में बिताते हैं। देर शाम तक विभिन्न कार्यक्रमों में डॉ. कलाम की सक्रियता तथा स्फूर्ति काबिलेतारीफ है। ऊर्जा का ऐसा प्रवाह केवल गहरी प्रतिबद्धता तथा समर्पण से ही आ सकता है। डॉ. कलाम खानपान में पूर्णत: शाकाहारी व्यक्ति हैं। वे मदिरापान से बिलकुल परहेज करते हैं। उनका निजी जीवन अनुकरणीय है। डॉ. कलाम की याददाश्त बहुत तेज है। वे घटनाओं तथा बातों को याद रखते हैं।

डॉ कलाम का बचपन

डॉ. कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम् कस्बे में एक मध्यमवर्गीय तमिल परिवार में हुआ था। इनके पिता जैनुलाबदीन की कोई बहुत अच्छी औपचारिक शिक्षा नहीं हुई थी, और न ही वे कोई बहुत धनी व्यक्ति थे। इसके बावजूद वे बुद्धिमान थे और उनमें उदारता की सच्ची भावना थी। इनकी माँ, आशियम्मा उनके जीवन की आदर्श थीं। वे लोग अपने पुश्तैनी घर में रहते थे, जो कि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य बना था तथा रामेश्वरम् के प्रसिद्ध शिव मंदिर से महज दस मिनट की दूरी पर स्थित मस्जिदवाली गली में था। इनके पिताजी एक स्थानीय ठेकेदार के साथ मिलकर लकड़ी की नौकाएँ बनाने का काम करते थे जो हिन्दू तीर्थयात्रियों को रामेश्वरम् से धनुषकोटि ले जाती थीं। डॉ. कलाम को अपने पिताजी से विरासत के रूप में ईमानदारी और आत्मानुशासन, तथा माँ से ईश्वर में विश्वास और करुणा का भाव मिला।

डॉ कलाम की प्रारंभिक शिक्षा

उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा रामेश्वरम् के प्राइमरी स्कूल से प्राप्त की। इसके बाद आगे की स्कूली शिक्षा इन्होंने रामनाथपुरम् के श्वार्ट्ज हाई स्कूल से प्राप्त की। उनके शिक्षक अयादुरै सोलोमन कहा करते थे- ”जीवन में सफल होने और नतीजों को हासिल करने के लिए तुम्हें तीन प्रमुख बातों को समझना चाहिए- "इच्छा, आस्था और आशा”। इसलिए श्वार्ट्ज हाइ स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद वे सफलता हासिल करने के प्रति आत्मविश्वास से सराबोर छात्र थे। इन्होंने आगे पढ़ाई करने का फैसला कर लिया। उन दिनों इन्हें व्यावसायिक शिक्षा की संभावानाओं के बारे में जानकारी तो थी नहीं। इसलिए इन्होंने सन् 1950 में इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए तिरुचिरापल्ली के सेंट जोसेफ कॉलेज में बी.एस-सी. में दाखिला ले लिया। बी.एस-सी. पूरा करने के बाद इन्होंने यह महसूस किया कि भौतिकी उनका बहुत प्रिय विषय नहीं हैं। इसलिए उन्हें अपना सपना पूरा करने के लिए इंजीनियरिंग में जाना चाहिए था। फिर उन्होंने दक्षिण भारत में तकनीकी शिक्षा के लिए मशहूर एक विशेष संस्थान मद्रास इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी (एम.आई.टी.) में दाखिला ले लिया। एम.आई.टी. में उड़ान संबंधी मशीनों की विभिन्न कार्यप्रणालियों को समझाने के लिए नमूने के तौर पर रखे गए दो विमानों ने इन्हें काफी आकर्षित किया। इन्होंने पहला साल पूरा करने के बाद वैमानिकी यानी एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग को अपने विशेष विषय के रूप में चुना। स्नातक के बाद वे एम.आई.टी. से एक प्रशिक्षु के रूप में हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एच.ए.एल.), बंगलौर चले गए। वहाँ इन्होंने टीम के एक सदस्य के रूप में विमान के इंजनों के अनुरक्षण पर काम किया। यहाँ इन्होंने दोनों तरह के इंजनों- पिस्टन इंजन तथा टरबाइन इंजन पर काम किया। इसके साथ ही उन्होंने रेडियल इंजन तथा ड्रम आपरेशनों में भी प्रशिक्षण प्राप्त किया। 

वैमानिकी इंजीनियर बन करियर की हुई शुरुआत

जब वे एच.ए.एल. से एक वैमानिकी इंजीनियर बनकर निकले तो इनके पास नौकरी के दो बड़े अवसर थे। ये दोनों ही उनके बरसों पुराने उड़ान के सपने को पूरा करने वाले थे। एक अवसर भारतीय वायुसेना का था और दूसरा रक्षा मंत्रालय के अधीन तकनीकी विकास एवं उत्पादन निदेशालय, का था। उन्होंने दोनों जगहों पर साक्षात्कार दिया। वे रक्षा मंत्रालय के तकनीकी विकास एवं उत्पादन निदेशालय में चुन लिए गए। सन् 1958 में इन्होंने दो सौ पचास रूपए के मूल वेतन पर निदेशालय के तकनीकी केंद्र (उड्डयन) में वरिष्ठ वैज्ञानिक सहायक के पद पर काम सँभाल लिया। निदेशालय में नौकरी के पहले साल के दौरान इन्होंने आफिसर-इंचार्ज आर. वरदराजन की मदद से एक अल्ट्रासोनिक लक्ष्यभेदी विमान का डिजाइन तैयार करने में सफलता हासिल कर ली। विमानों के रख-रखाव का अनुभव हासिल करने के लिए इन्हें एयरक्रॉफ्ट एण्ड आर्मामेंट टेस्टिंग यूनिट, कानपुर भेजा गया। उस समय वहाँ एम.के.-1 विमान के परीक्षण का काम चल रहा था। इसकी कार्यप्रणालियों के मूल्यांकन को पूरा करने के काम में इन्होंने भी हिस्सा लिया। वापस आने पर इन्हें बंगलौर में स्थापित वैमानिकी विकास प्रतिष्ठान में भेज दिया गया। यहाँ ग्राउंड इक्विपमेंट मशीन के रूप में स्वदेशी होवरक्रॉफ्ट का डिजाइन तथा विकास करने के लिए एक टीम बनाई गई। वैज्ञानिक सहायक के स्तर पर इसमें चार लोग शामिल थे, जिसका नेतृत्व करने का कार्यभार निदेशक डॉ. ओ. पी. मेदीरत्ता ने डॉ. कलाम पर सौंपा। उड़ान में इंजीनियरिंग मॉडल शुरू करने के लिए इन्हें तीन साल का वक्त दिया गया। भगवान् शिव के वाहन के प्रतीक रूप में इस होवरक्राफ्ट को 'नंदी' नाम दिया गया।

डॉ कलाम के जीवन में मील के पत्थर

कालान्तर में इन्हें इंडियन कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च की ओर से साक्षात्कार के

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम

परिचय

भारत रत्न डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम हमारे देश के प्रख्यात वैज्ञानिक हैं जो भारत गणराज्य के राष्ट्रपति रह चुके हैं। उनका पूरा नाम है अवुल पकीर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम। वे भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति रहे हैं। वे एक गैरराजनीतिक व्यक्ति रहे हैं फिर भी विज्ञान की दुनिया में चमत्कारिक प्रदर्शन के कारण इतने लोकप्रिय रहे कि देश ने उन्हें सिर माथे पर उठा लिया तथा सर्वोच्च पद पर आसीन कर दिया। एक वैज्ञानिक का राष्ट्रपति पद पर पहुंचना पूरे विज्ञान जगत के लिए सम्मान तथा प्रतिष्ठा की बात थी। कहते हैं कि जो व्यक्ति किसी क्षेत्र विशेष में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता है, उसके लिए दूसरे क्षेत्रों में भी सब कुछ आसान और सहज हो जाता है। डॉ. कलाम इस बात को चरितार्थ करते हैं। भारत को अंतरिक्ष में पहुंचाने तथा मिसाइल क्षमता प्रदान करने का श्रेय डॉ. कलाम को जाता है। उनके द्वारा सफलतापूर्वक विकसित अग्नि और पृथ्वी जैसी बैलिस्टिक मिसाइलों ने राष्ट्र की सुरक्षा को मजबूती प्रदान की है। डॉ. कलाम अविवाहित नागरिक हैं और इनकी जीवन-गाथा किसी रोचक उपन्यास के नायक की कहानी से कम नहीं है। चमत्कारिक प्रतिभा के धनी डॉ. कलाम का व्यक्तित्व इतना उन्नत है कि वह सभी धर्म, जाति एवं सम्प्रदायों के व्यक्ति नज़र आते हैं। वे एक ऐसे सर्वस्वीकार्य भारतीय हैं जो देश के सभी वर्गों के लिए 'एक आदर्श' बन चुके हैं। विज्ञान की दुनिया से होकर देश का प्रथम नागरिक बनना कोई कपोल-कल्पना नहीं है बल्कि यह एक जीवित प्रणेता की सत्यकथा है।

इतने महत्तवपूर्ण व्यक्ति के बारे में कुछ भी कहना सरल नहीं है। वेशभूषा, बोलचाल के लहजे, अच्छे-खासे सरकारी आवास को छोड़कर हॉस्टल का सादगीपूर्ण जीवन, ये बातें उनके संपर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर एक सम्मोहक प्रभाव छोड़ती हैं। डॉ. कलाम एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, देश के विकास और युवा मस्तिष्कों को प्रज्ज्वलित करने में अपनी तल्लीनता के साथ साथ वे पर्यावरण की चिंता भी खूब करते हैं, साहित्य में रूचि रखते हैं, कविता लिखते हैं, वीणा बजाते हैं, तथा अध्यात्म से बहुत गहरे जुड़े हुए हैं। डॉ. कलाम में अपने काम के प्रति जबरदस्त दीवानगी है। उनके लिए कोई भी समय काम का समय होता है। वह अपना अधिकांश समय कार्यालय में बिताते हैं। देर शाम तक विभिन्न कार्यक्रमों में डॉ. कलाम की सक्रियता तथा स्फूर्ति काबिलेतारीफ है। ऊर्जा का ऐसा प्रवाह केवल गहरी प्रतिबद्धता तथा समर्पण से ही आ सकता है। डॉ. कलाम खानपान में पूर्णत: शाकाहारी व्यक्ति हैं। वे मदिरापान से बिलकुल परहेज करते हैं। उनका निजी जीवन अनुकरणीय है। डॉ. कलाम की याददाश्त बहुत तेज है। वे घटनाओं तथा बातों को याद रखते हैं।

डॉ कलाम का बचपन

डॉ. कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम् कस्बे में एक मध्यमवर्गीय तमिल परिवार में हुआ था। इनके पिता जैनुलाबदीन की कोई बहुत अच्छी औपचारिक शिक्षा नहीं हुई थी, और न ही वे कोई बहुत धनी व्यक्ति थे। इसके बावजूद वे बुद्धिमान थे और उनमें उदारता की सच्ची भावना थी। इनकी माँ, आशियम्मा उनके जीवन की आदर्श थीं। वे लोग अपने पुश्तैनी घर में रहते थे, जो कि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य बना था तथा रामेश्वरम् के प्रसिद्ध शिव मंदिर से महज दस मिनट की दूरी पर स्थित मस्जिदवाली गली में था। इनके पिताजी एक स्थानीय ठेकेदार के साथ मिलकर लकड़ी की नौकाएँ बनाने का काम करते थे जो हिन्दू तीर्थयात्रियों को रामेश्वरम् से धनुषकोटि ले जाती थीं। डॉ. कलाम को अपने पिताजी से विरासत के रूप में ईमानदारी और आत्मानुशासन, तथा माँ से ईश्वर में विश्वास और करुणा का भाव मिला।

डॉ कलाम की प्रारंभिक शिक्षा

उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा रामेश्वरम् के प्राइमरी स्कूल से प्राप्त की। इसके बाद आगे की स्कूली शिक्षा इन्होंने रामनाथपुरम् के श्वार्ट्ज हाई स्कूल से प्राप्त की। उनके शिक्षक अयादुरै सोलोमन कहा करते थे- ”जीवन में सफल होने और नतीजों को हासिल करने के लिए तुम्हें तीन प्रमुख बातों को समझना चाहिए- "इच्छा, आस्था और आशा”। इसलिए श्वार्ट्ज हाइ स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद वे सफलता हासिल करने के प्रति आत्मविश्वास से सराबोर छात्र थे। इन्होंने आगे पढ़ाई करने का फैसला कर लिया। उन दिनों इन्हें व्यावसायिक शिक्षा की संभावानाओं के बारे में जानकारी तो थी नहीं। इसलिए इन्होंने सन् 1950 में इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए तिरुचिरापल्ली के सेंट जोसेफ कॉलेज में बी.एस-सी. में दाखिला ले लिया। बी.एस-सी. पूरा करने के बाद इन्होंने यह महसूस किया कि भौतिकी उनका बहुत प्रिय विषय नहीं हैं। इसलिए उन्हें अपना सपना पूरा करने के लिए इंजीनियरिंग में जाना चाहिए था। फिर उन्होंने दक्षिण भारत में तकनीकी शिक्षा के लिए मशहूर एक विशेष संस्थान मद्रास इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी (एम.आई.टी.) में दाखिला ले लिया। एम.आई.टी. में उड़ान संबंधी मशीनों की विभिन्न कार्यप्रणालियों को समझाने के लिए नमूने के तौर पर रखे गए दो विमानों ने इन्हें काफी आकर्षित किया। इन्होंने पहला साल पूरा करने के बाद वैमानिकी यानी एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग को अपने विशेष विषय के रूप में चुना। स्नातक के बाद वे एम.आई.टी. से एक प्रशिक्षु के रूप में हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एच.ए.एल.), बंगलौर चले गए। वहाँ इन्होंने टीम के एक सदस्य के रूप में विमान के इंजनों के अनुरक्षण पर काम किया। यहाँ इन्होंने दोनों तरह के इंजनों- पिस्टन इंजन तथा टरबाइन इंजन पर काम किया। इसके साथ ही उन्होंने रेडियल इंजन तथा ड्रम आपरेशनों में भी प्रशिक्षण प्राप्त किया।

वैमानिकी इंजीनियर बन करियर की हुई शुरुआत

जब वे एच.ए.एल. से एक वैमानिकी इंजीनियर बनकर निकले तो इनके पास नौकरी के दो बड़े अवसर थे। ये दोनों ही उनके बरसों पुराने उड़ान के सपने को पूरा करने वाले थे। एक अवसर भारतीय वायुसेना का था और दूसरा रक्षा मंत्रालय के अधीन तकनीकी विकास एवं उत्पादन निदेशालय, का था। उन्होंने दोनों जगहों पर साक्षात्कार दिया। वे रक्षा मंत्रालय के तकनीकी विकास एवं उत्पादन निदेशालय में चुन लिए गए। सन् 1958 में इन्होंने दो सौ पचास रूपए के मूल वेतन पर निदेशालय के तकनीकी केंद्र (उड्डयन) में वरिष्ठ वैज्ञानिक सहायक के पद पर काम सँभाल लिया। निदेशालय में नौकरी के पहले साल के दौरान इन्होंने आफिसर-इंचार्ज आर. वरदराजन की मदद से एक अल्ट्रासोनिक लक्ष्यभेदी विमान का डिजाइन तैयार करने में सफलता हासिल कर ली। विमानों के रख-रखाव का अनुभव हासिल करने के लिए इन्हें एयरक्रॉफ्ट एण्ड आर्मामेंट टेस्टिंग यूनिट, कानपुर भेजा गया। उस समय वहाँ एम.के.-1 विमान के परीक्षण का काम चल रहा था। इसकी कार्यप्रणालियों के मूल्यांकन को पूरा करने के काम में इन्होंने भी हिस्सा लिया। वापस आने पर इन्हें बंगलौर में स्थापित वैमानिकी विकास प्रतिष्ठान में भेज दिया गया। यहाँ ग्राउंड इक्विपमेंट मशीन के रूप में स्वदेशी होवरक्रॉफ्ट का डिजाइन तथा विकास करने के लिए एक टीम बनाई गई। वैज्ञानिक सहायक के स्तर पर इसमें चार लोग शामिल थे, जिसका नेतृत्व करने का कार्यभार निदेशक डॉ. ओ. पी. मेदीरत्ता ने डॉ. कलाम पर सौंपा। उड़ान में इंजीनियरिंग मॉडल शुरू करने के लिए इन्हें तीन साल का वक्त दिया गया। भगवान् शिव के वाहन के प्रतीक रूप में इस होवरक्राफ्ट को 'नंदी' नाम दिया गया।

डॉ कलाम के जीवन में मील के पत्थर

कालान्तर में इन्हें इंडियन कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च की ओर से साक्षात्कार केलिए बुलावा आया। उनका साक्षात्कार अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई ने खुद लिया। इस साक्षात्कार के बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति में रॉकेट इंजीनियर के पद पर उन्हें चुन लिया गया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति में इनका काम टाटा इंस्टीट्यूट आफ फण्डामेंटल रिसर्च के कंप्यूटर केंद्र में काम शुरू किया। सन् 1962 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति ने केरल में त्रिवेंद्रम के पास थुंबा नामक स्थान पर रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र स्थापित करने का फैसला किया। थुंबा को इस केंद्र के लिए सबसे उपयुक्त स्थान के रूप में चुना गया था, क्योंकि यह स्थान पृथ्वी के चुंबकीय अक्ष के सबसे करीब था। उसके बाद शीघ्र ही डॉ. कलाम को रॉकेट प्रक्षेपण से जुड़ी तकनीकी बातों का प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए अमेरिका में नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन यानी 'नासा' भेजा गया। यह प्रशिक्षण छह महीने का था। जैसे ही डॉ. कलाम नासा से लौटे, 21 नवंबर, 1963 को भारत का 'नाइक-अपाचे' नाम का पहला रॉकेट छोड़ा गया। यह साउंडिंग रॉकेट नासा में ही बना था। डॉ. साराभाई ने राटो परियोजना के लिए डॉ. कलाम को प्रोजेक्ट लीडर नियुक्त किया। डॉ. कलाम ने विशेष वित्तीय शक्तियाँ हासिल की, प्रणाली विकसित की तथा 8 अक्टूबर 1972 को उत्तर प्रदेश में बरेली एयरफोर्स स्टेशन पर इस प्रणाली का सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया।

उनके जीवन का अगला बड़ा अवसर तब आया जब डॉ. कलाम को भारत के सैटेलाइट लांच वेहिकल (एस.एल.वी.) परियोजना का प्रबंधक बनाया गया। परियोजना प्रमुख के रूप में नामांकित करना एक सम्मान भी था और चुनौती भी थी। एस.एल.वी.-3 परियोजना का मुख्य उद्देश्य एक भरोसेमंद प्रमोचन यान विकसित करना था जो चालीस किलोग्राम के एक उपग्रह को पृथ्वी से 400 किलोमीटर की ऊंचाई वाली कक्षा में स्थापित कर सके। इसमें एक बड़ा काम था यान के चार चरणों के लिए एक रॉकेट मोटर सिस्टम का विकास। हाई एनर्जी प्रोपेलेंट के इस्तेमाल में सक्षम रॉकेट मोटर सिस्टम में इस्तेमाल के लिए 8.5 टन प्रोपेलेंट ग्रेन निर्मित किया जाना था। एक अन्य कार्य था नियंत्रण तथा मार्गदर्शन। यह एक बड़ी परियोजना थी जिसमें दो सौ पचास उप-भाग और चालीस बड़ी उपप्रणालियाँ शामिल थीं। सभी गतिविधियों में तालमेल बैठाना और टीम का कुशल नेतृत्व करना डॉ. कलाम के लिए एक चुनौती थी। अंततः कड़ी मेहनत के बाद 18 जुलाई, 1980 को सुबह आठ बजकर तीन मिनट पर श्रीहरिकोटा रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र से एस.एल.वी.-3 ने सफल उड़ान भरी। इस परियोजना की सफलता ने डॉ. कलाम को राष्ट्रीय पहचान दी। इस उपलब्धि के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा 26 जनवरी 1981 को 'पद्मभूषण' से सम्मानित किया गया।

उन दिनों रक्षा अनुसंधान तथा विकास प्रयोगशाला में एक ऐसे नेतृत्व की जरूरत थी जो कार्य को गति प्रदान कर सके तथा मिसाइलों के विकास का काम तेजी से आगे बढ़ा सके। प्रो. राजा रामन्ना ने डॉ. कलाम के सामने गाइडेड मिसाइल डेवेलपमेंट प्रोग्राम को अपने हाथ में लेने का प्रस्ताव रखा। इस चुनौतीपूर्ण प्रस्ताव को डॉ. कलाम ने सहर्ष स्वीकार किया। फरवरी 1982 में डॉ. कलाम को डी.आर.डी.एल का निदेशक नियुक्त किया गया। उसी समय अन्ना विश्वविद्यालय, मद्रास ने इन्हें 'डॉक्टर आफ साइंस' की मानक उपाधि से सम्मानित किया। एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल करने के करीब बीस साल बाद यह मानद उपाधि डॉ. कलाम को प्राप्त हुई। डॉ. कलाम ने रक्षामंत्री के तत्कालीन वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. वी. एस. अरूणाचलम के मार्गदर्शन में इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (आई.जी.एम.डी.पी.) का प्रस्ताव तैयार किया। स्वदेशी मिसाइलों के विकास के लिए एक स्पष्ट और सुपरिभाषित मिसाइल कार्यक्रम तैयार करने के उद्देश्य से डॉ. कलाम की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई।

इस परियोजना के प्रथम चरण में एक नीची ऊँचाई पर तुरंत मार करनेवाली टैक्टिकल कोर वेहिकल मिसाइल और जमीन से जमीन पर रॉकेट  मध्यम दूरी तक मार सकने वाली मिसाइल के विकास एवं उत्पादन पर जोर था। दूसरे चरण में जमीन से हवा में मार सकने वाली मिसाइल, तीसरी पीढ़ी की टैंकभेदी गाइडेड मिसाइल और डॉ. कलाम के सपने रि-एंट्री एक्सपेरिमेंट लान्च वेहिकल (रेक्स) का प्रस्ताव रखा गया था। जमीन से जमीन पर मार करने वाली मिसाइल प्रणाली को 'पृथ्वी' और टैक्टिकल कोर वेहिकल मिसाइल को 'त्रिशूल' नाम दिया गया। जमीन से हवा में मार करने वाली रक्षा प्रणाली को 'आकाश' और टैंकरोधी मिसाइल परियोजना को 'नाग' नाम दिया गया। डॉ. कलाम ने अपने मन में सँजोए रेक्स के बहुप्रतीक्षित सपने को 'अग्नि' नाम दिया। 27 जुलाई, 1983 को आई.जी.एम.डी.पी. की औपचारिक रूप से शुरूआत की गई। मिसाइल कार्यक्रम के अंतर्गत पहली मिसाइल का प्रक्षेपण 16 सितंबर, 1985 को किया गया। इस दिन श्रीहरिकोटा स्थित परीक्षण रेंज से 'त्रिशूल' को छोड़ा गया। यह एक तेज प्रतिक्रिया प्रणाली है जिसे नीची उड़ान भरने वाले विमानों, हेलीकॉप्टरों तथा विमानभेदी मिसाइलों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है। 25 फरवरी, 1988 को दिन में ग्यारह बजकर तेईस मिनट पर 'पृथ्वी' को छोड़ा गया। यह देश में रॉकेट विज्ञान के इतिहास में एक युगांतरकारी घटना थी। यह एक सौ पचास किलोमीटर तक एक हजार किलोग्राम पारंपरिक विस्फोटक सामग्री ले जाने की क्षमता वाली जमीन से जमीन पर मार करने वाली मिसाइल है। 22 मई, 1989 को 'अग्नि' का प्रक्षेपण किया गया। यह लंबी दूरी के फ्लाइट वेहिकल के लिए एक तकनीकी प्रदर्शक था। साथ ही 'आकाश' पचास किलोमीटर की अधिकतम अंतर्रोधी रेंजवाली मध्यम की वायु-रक्षा प्रणाली है। उसी प्रकार 'नाग' टैंक भेदी मिसाइल है, जिसमें 'दागो और भूल जाओ' तथा ऊपर से आक्रमण करने की क्षमताएँ हैं। डॉ. कलाम की पहल पर भारत द्वारा एक रूसी कंपनी के सहयोग से सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल बनाने पर काम शुरू किया गया। फरवरी 1998 में भारत और रूस के बीच समझौते के अनुसार भारत में ब्रह्मोस प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना की गई। 'ब्रह्मोस' एक सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल है जो धरती, समुद्र, तथा हवा, कहीं भी दागी जा सकती है। यह पूरी दुनिया में अपने तरह की एक खास मिसाइल है जिसमें अनेक खूबियां हैं।

वर्ष 1990 के गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्र ने अपने मिसाइल कार्यक्रम की सफलता पर खुशी मनाई। डॉ. कलाम और डॉ. अरूणाचलम को भारत सरकार द्वारा 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया गया। अक्टूबर, 1992 से दिसंबर 1999 तक रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार, और डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन (डी.आर.डी.ओ.) के महानिदेशक के रूप में डॉ. कलाम को अनुसंधान व विकास में सभी प्रयोगशालाओं का मार्गदर्शन करने और फलदायी संभाव्यतावाली परियोजनाओं की प्रगति पर निगरानी रखने का संपूर्ण दायित्व प्राप्त हुआ। उन्हें सन् 1997 में 'भारत-रत्न' की उपाधि प्रदान की गई। भारत ने 11 तथा 13 मई 1998 में राजस्थान के पोखरण में दूसरी बार कुल 5 सफल परमाणु परीक्षण किए। इसके पहले 18 मई, 1974 को पोखरण में भारत ने पहला प्रायोगिक परमाणु परीक्षण किया था। आपरेशन शक्ति के अंतर्गत 1998 में किए गए परीक्षणों के बाद भारत में खुद को परमाणुशक्ति संपन्न राष्ट्र घोषित किया। इन परीक्षणों में परमाणु ऊर्जा विभाग तथा रक्षा अनुसंधान तथा विकास संगठन की सामूहिक भूमिका था। इसमें डॉ. कलाम की बड़ी ही अहम भूमिका थी।

डॉ. कलाम ने अपनी समस्त ऊर्जा को राष्ट्र-निर्माण की दिशा में लगाने के लिए दिसंबर 1999 में डी.आर.डी.ओ. को छोड़ने का फैसला किया क्योकिं पद की सीमाएँ उन्हें रोकती थीं। परंतु सरकार उन्हें छोड़ना नहीं चाहती थी। उन्हें 'इंडिया मिलेनियम मिशन' नामक परियोजना में अपने विजन 2020 को कार्यान्वित करने के लिए कहा गया। उन्हें भारत सरकार में कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया और भारत सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार का पद दिया गया। वे 2001 तक इस पद पर रहे।

भारत के 11वें राष्ट्रपति चुने गए

राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार के रूप में नामांकित किए जाने का सभी ने स्वागत किया। 18 जुलाई, 2002 को संपन्न हुए चुनाव में डॉ. कलाम नब्बे प्रतिशत मतों के भारी बहुमत से भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति चुने गए। उन्हें 25 जुलाई 2002 को संसद भवन के अशोक हॉल में राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई गई। उनका कार्यकाल 25 जुलाई 2007 को समाप्त हुआ।

अपने अंतिम दिनों तक भी डॉ. कलाम काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, भारतीय प्रबंधन संस्थान शिलांग, भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद तथा भारतीय प्रबंधन संस्थान इंदौर में आगंतुक प्रोफेसर बने हुए थे। साथ ही भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान तिरूवंतपुरम् में कुलाधिपति तथा अन्ना विश्वविद्यालय चेन्नई में एयरो इंजीनियरिंग के प्रध्यापक के पद पर भी नियुक्त थे।

सर्वधर्म समभाव के प्रतीक थे

डॉ. कलाम बातचीत में बड़े विनोदप्रिय स्वभाव के हैं। अपनी बात को बड़ी सरलता तथा साफगोई से सामने रखते हैं। प्राय: उनकी बातों में हास्य का पुट होता है। लेकिन बात बहुत सटीक तौर पर करते हैं। डॉ. कलाम सभी मुद्दों को मानवीयता की कसौटी पर परखते हैं। उनके लिए जाति, धर्म, वर्ग, समुदाय मायने नहीं रखते। वे सर्वधर्म समभाव के प्रतीक हैं। वह इंसान के जीवन को ऊंचा उठाना चाहते हैं। उसे बेहतरी की ओर ले जाना चाहते हैं। उनका मानवतावाद मनुष्यों की समानता के आधारभूत सिद्धांत पर आधारित है। 25 जुलाई, 2002 की शाम को भारत के राष्ट्रपति का सर्वोच्च पद सँभालने के दिन घटित एक बात से इसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। उस दिन राष्ट्रपति भवन में एक प्रार्थना सभा आयोजित की गई थी जिसमें रामेश्वरम् मसजिद के मौलवी, रामेश्वरम् मंदिर के पुजारी, सेंट जोसेफ कॉलेज के फॉदर रेक्टर तथा अन्य लोगों ने भाग लिया था। उनके बारे में जो पहलू सबसे कम प्रचारित है वह है उनकी उदारता या परोपकार की भावना।

कलाम द्वारा रचित पुस्तकें

उनके द्वारा लिखी गयी पुस्तकें बहुत लोकप्रिय रही हैं। वे अपनी किताबों की रॉयल्टी का अधिकांश हिस्सा स्वयंसेवी संस्थाओं को मदद में दे देते हैं। मदर टेरेसा द्वारा स्थापित 'सिस्टर्स आफ चैरिटी' उनमें से एक है। विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें कई पुरस्कार मिले हैं। इनमें से कुछ पुरस्कारों के साथ नकद राशियां भी थीं। वह इन पुरस्कार राशियों को परोपकार के कार्यों के लिए अलग रखते हैं। जब-जब देश में प्राकृतिक आपदाएँ आई हैं, तब-तब डॉ. कलाम की मानवीयता एवं करुणा निखरकर सामने आई है। वह अन्य मनुष्यों के कष्ट तथा पीड़ा के विचार मात्र से दुःखी हो जाते हैं। वह प्रभावित लोगों को राहत पहुचाँने के लिए डी.आर.डी.ओ. के नियंत्रण में मौजूद सभी संसाधनों को एकत्रित करते। जब वे रक्षा अनुसंधान तथा विकास संगठन में कार्यरत थे तो उन्होंने हर राष्ट्रीय आपदा में विभाग की ओर से बढ़ चढ़कर राहत कोष में मदद की।

डॉ. कलाम ने "विंग्स आफ फायर”, "इग्नाइटेड माइंड्स”, जैसी कई सुप्रसिद्ध पुस्तकें लिखी हैं। डॉ. कलाम को अनेक सम्मान और पुरस्कार मिले हैं जिनमें शामिल हैं- इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स का नेशनल डिजाइन अवार्ड; एरोनॉटिकल सोसाइटी आफ इंडिया का डॉ. बिरेन रॉय स्पेस अवार्ड; एस्ट्रोनॉटिकल सोसाइटी आफ इंडिया का आर्यभट्ट पुरस्कार, विज्ञान के लिए जी.एम. मोदी पुरस्कार, राष्ट्रीय एकता के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार।

पुरस्कार एवं सम्मान

डॉक्टर कलाम के 79 वें जन्मदिन को संयुक्त राष्ट्र द्वारा विश्व विद्यार्थी दिवस के रूप में मनाया गया था। भारत सरकार द्वारा उन्हें 1981 में पद्म भूषण और 1990 में पद्म विभूषण का सम्मान प्रदान किया गया जो उनके द्वारा इसरो और डी आर डी ओ में कार्यों के दौरान वैज्ञानिक उपलब्धियों के लिये तथा भारत सरकार के वैज्ञानिक सलाहकार के रूप में कार्य हेतु प्रदान किया गया था| 1997 में कलाम साहब को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया जो उनके वैज्ञानिक अनुसंधानों और भारत में तकनीकी के विकास में अभूतपूर्व योगदान हेतु दिया गया था |

वर्ष 2005 में स्विट्ज़रलैंड की सरकार ने डॉक्टर कलाम के स्विट्ज़रलैंड आगमन के उपलक्ष्य में 26 मई को विज्ञान दिवस घोषित किया| नेशनल स्पेस सोशायटी ने वर्ष 2013 में उन्हें अंतरिक्ष विज्ञान सम्बंधित परियोजनाओं के कुशल संचलन और प्रबंधन के लिये वॉन ब्राउन अवार्ड से पुरस्कृत किया।

डॉ कलाम का निधन

27 जुलाई 2015 की शाम अब्दुल कलाम भारतीय प्रबंधन संस्थान शिलोंग में 'रहने योग्य ग्रह' पर एक व्याख्यान दे रहे थे जब उन्हें जोरदार कार्डियक अरेस्ट (दिल का दौरा) हुआ और ये बेहोश हो कर गिर पड़े। लगभग 6:30 बजे गंभीर हालत में इन्हें बेथानी अस्पताल में आईसीयू में ले जाया गया और दो घंटे के बाद इनकी मृत्यु की पुष्टि कर दी गई।

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