चन्द्रगुप्त मौर्य (322_298 ई. पू.)
विष्णु गुप्त चाणक्य की सहायता से मगध के नंद वंश का विनाश कर चंद्रगुप्त मौर्य ने मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। 322 ई.पू.वह मगध का शासक बना। रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में स्पष्ट तय है चंद्रगुप्त मौर्य का नाम दिया गया है यूनानी लेखक स्ट्रेबो तथा जिस्टन ने चंद्रगुप्त मौर्य को सैंड्रोक्रोटोस एरियन तथा प्लूटार्क ने एंद्रोकोटस तथा फिलरकस ने सैंड्रोक्रोटस कहां है सर विलियम जॉन्स महोदय ने सर्वप्रथम 1993 ईस्वी में सैंड्रोकॉटोस की पहचान भारतीय ग्रंथों के चंद्रगुप्त मौर्य से की। अतः यूनानी विवो में प्राप्त सैंड्रोक्रोटस ही चंद्रगुप्त मौर्य हैं बोध अनुश्रुति के अनुसार जब चंद्रगुप्त मौर्य माता के गर्भ में ही था उसी समय उसके पिता (जोकि मौर्य नगर के प्रमुख थे) कि एक युद्ध में मृत्यु हो गई उसके तत्पश्चात उसकी माता सुरक्षा के निमित्त पाटलिपुत्र पहुंची एवं वही चंद्रगुप्त का जन्म हुआ जन्म के पश्चात उसे एक गोपालक को समर्पित कर दिया गया गोपालक ने उसे कुछ बड़ा होने पर एक शिकारी को बेच दिया अपनी प्रतिभा के कारण उसने अपने हम उम्र बालकों में प्रमुखता हासिल की वह बालकों की मंडली का राजा बन कर आपसी झगड़ों का फैसला किया करता था जिसे राजकिलम खेल कहा जाता था एक दिन वह राजकिरण खेल में अपना फैसला देने में व्यस्त था तभी चाणक्य उधर से गुजरा चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य की प्रखर बुद्धि को देख अपने सूक्ष्म दृष्टि से उसके भावी गुणों का अनुमान लगाया इस प्रकार 1000 कर्षापन देकर चाणक्य ने शिकारी से चंद्रगुप्त को खरीद लिया चंद्रगुप्त के भाग्य की प्रबलता इस तथ्य से परिलक्षित होती है कि उसे खरीदने वाला चाणक्य तक्षशिला का अचार्य था तक्षशिला उस समय विद्या का प्रमुख केंद्र था इस प्रकार चाणक्य द्वारा चंद्रगुप्त को सभी का लाभ एवं विद्याओं की विधिवत शिक्षा प्राप्त हुई प्रतिभावन तो वह था ही युद्ध विद्या सहित सभी विधाओं में वह पारंगत हो गया
चंद्रगुप्त मौर्य की उपलब्धियां
चंद्रगुप्त मौर्य की प्रमुख उपलब्धियां निम्न थी
1. यूनानियों के विदेशी शासन से देश को मुक्त कराया 2. नंद वंश के घरनित एवं अत्याचार पूर्ण शासक को चाणक्य की सहायता से समाप्त किया
3. 25 वर्ष की आयु में 322 ईसा पूर्व मगध का सिहासन प्राप्त कर प्रथम अखिल भारतीय साम्राज्य की स्थापना की
4. यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर को पराजित कर उससे संधि की एवं अंतरष्ट्रीय संबंध विकसित किए
सिहासनारूड होने के पश्चात सिकंदर से चंद्रगुप्त का सामना नहीं हुआ 323 ईसा पूर्व सिकंदर की मृत्यु के पश्चात सिंह एवं पंजाब में सिकंदर के यूनानी क्षेत्रपो का राज था । अतः चंद्रगुप्त मौर्य ने 317 ईसा पूर्व में व्यापक अभियान छेड़ कर पश्चिमोत्तर सीमा पर इन यूनानी क्षेत्रपो पराजित किया और भारत को यह यूनानियों से पूर्णतया मुक्त किया इस तारतम्य में यूनानी इतिहासकार जस्टिन लिखता है सिकंदर की मृत्यु के पश्चात भारत ने अपनी गर्दन से दक्षता का जुआ उतार फेंका इस स्वतंत्रता का जन्मदाता सैंड्रोकॉटस चंद्रगुप्त था सिंध तथा पंजाब में अपनी स्थिति मजबूत कर लेने के बाद चंद्रगुप्त महोदय मगध में धनानंद के शासन को समाप्त करने हेतु अग्रसर हुआ नंदवंशी घनानंद ने एक बार चाणक्य को अपमानित किया था इससे क्रोधित हो चाणक्य ने नंद वंश को समूल नष्ट करने की प्रतिज्ञा की थी इसी तारतम्य में चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य को अपना प्रमुख अस्त्र बनाया बौद्ध एवं जैन स्त्रोतों से पता चलता है कि सर्वप्रथम चंद्रगुप्त ने नंद साम्राज्य के केंद्रीय भाग पर आक्रमण किया था परंतु उसे सफलता नहीं मिली एक अनुश्रुति के अनुसार प्रथम बार असफल होने के बाद जब चंद्रगुप्त को एक वृद्धा ने भात खाने को दिया तो थाली के बीच से भात लेकर खाने से उसका मुंह जल गया तब औरत औरत ने कहा थाली के बीच से गरम-गरम भात खाओगे तो जलोगे ही ठीक यह होगा कि किनारे से भात खाना शुरू करो तब चंद्रगुप्त को अपनी भूल का अहसास हुआ और उसने दूसरी बार सीमांत प्रदेशों से विजय प्राप्त करते हुए नंदू की राजधानी पर धावा बोला बौद्ध ग्रंथ मिलिंदपनहो से नंद वंश एवं चंद्रगुप्त मौर्य के बीच हुए विश्वयुद्ध का अंतर रंजीत विवरण मिलता है अंततः इस युद्ध में धनानंद मारा गया। चाणक्य की प्रतिज्ञा पूर्ण हुई और पाटलिपुत्र में 345 ईसा पूर्व में जन्मे बालक चंद्रगुप्त मौर्य का 322 ईसा पूर्व चाणक्य ने राज्य अभिषेक किया और चंद्रगुप्त ने एक अखिल भारतीय साम्राज्य की स्थापना की



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