Saturday, December 17, 2022

हिंदुओ के रितिरिवाज, के अनुसार (विवाह)

            विवाह (Marriage) 

विवाह शब्द *वि* उपसर्गपूर्वक *वह* धातु से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है

वधु, को वर के घर ले जाना या पहुंचाना, । प्राचीन भारतीय सामाजिक व्यवस्था में वर्णित षोडश संस्कारों में विवाह एक महत्वपूर्ण तथा आवश्यक संस्कार है। हिंदू समाज में विवाह को एक पवित्र धार्मिक संस्था के रूप में मान्यता दी गई है, 

जिसका उद्देश्य पति तथा पत्नी के सहयोग से विभिन्न पुरुषार्थो को पूरा करना था। जब समाज में 3 रणओ को पूर्ण करने का सिद्धांत लोकप्रिय हुआ तो विवाह संस्कार का महत्व और अधिक बढ़ गया क्योंकि विवाह के बिना मनुष्य पिरत  रण से मुक्त नहीं हो सकता। विवाह संस्कार के द्वारा ही स्त्री एवं पुरुष ग्रस्त जीवन में प्रवेश करते हैं। वास्तव में विवाह व्यक्तिगत एवं सामाजिक कृत्य होने के साथ-साथ एक धार्मिक कृत्य भी है 

विवाह के प्रकार  

स्मृति ग्रंथ मनुस्मृति में हमें विवाह के 8 प्रकारों का उल्लेख मिलता है

इनमें प्रथम चार ब्रह्म ,देव , आर्ष, एवम प्रजापत्य विवाहों को प्रशंसनीय एवं अंतिम चार असुर, गांधर्व, राक्षस,एवं पेशाच विवाहों को निंदनीय माना गया है इन सभी विवाहों का विवरण इस प्रकार है 

1. ब्रह्म विवाह    (Brahma marriage)


आश्वलायन ग्रह्म सुत्र, मनुस्मृति, यागवल्क्ये समृति के अनुसार यह सर्वोत्तम प्रकार का विवाह था। यह वर,वधु दोनों पक्षों की सहमति से होता है । इसमें पिता सावधानीपूर्वक वेदज्ञ एवं शीलवान वर का चयन करने के बाद उसे अपने घर बुलाता था। तथा उसकी पूजा करके वस्त्र आभूषणों से सुसज्जित कन्या को उसे प्रदान करता था । स्मृतियों के विवरण से यह भी पता चलता है कि यह विवाह कन्या के व्यस्क हो जाने पर ही किया जाता था। ब्राह्मणों के योग्य समझे जाने के कारण इसे ब्रह्म विवाह कहा जाता है भारत में आज भी यह सर्वाधिक प्रचलित विवाह प्रकार है

2. देव विवाह(Daiva marriage)


ब्रह्म विवाह की तुलना में यह निम्न कोटि का विवाह था। इस विवाह के तहत कन्या का पिता एक यज्ञ का आयोजन कराता था जिसमें बहुत से पुरोहित आमंत्रित किए जाते थे जो भी पुरोहित ही यज्ञ का अनुष्ठान विधिवत संपन्न करता था उसी के साथ कन्या का विवाह कर दिया जाता था क्योंकि देवताओं के लिए यज्ञ करते समय यह विवाह संपन्न होता था इसी कारण इसे_ देव विभाग _की संज्ञा दी गई है  

3. आर्ष विवाह (Arsha marriage)


इस विवाह में कन्या का पिता  1 जोड़ी गाय और बैल, याज्ञिक क्रिया संपन्न करने हेतु प्राप्त कर अपनी कन्या दान कर देता था। यह कन्या का मूल्य नहीं था। कुछ विद्वानों का विचार है कि यह विवाह केवल ऋषियों के साथ ही किया जाता था इसी कारण इसे आर्ष विवाह कहते थे। 

4. प्रजापत्य विवाह (prajapatya marriage)


आस्वलायन के अनुसार प्रजापत्य वह विवाह है जिसमे कन्या, वर को इस आदेश (तुम दोनों साथ-साथ धर्म का पालन करो) के साथ प्रदान की जाती थी। अर्थात इस विभाग के अंतर्गत कन्या का पिता वर को कन्या इस आदेश के साथ प्रदान करता था कि दोनों मिलकर सामाजिक एवं धार्मिक कर्तव्यों का निर्वाह करें। पिता बरसे इस प्रकार का आश्वासन प्राप्त कर लेता था ताकि वह जीवन भर साथ रहे। इस प्रकार के विवाह में वर पक्ष कन्या के पिता से कन्या मांगता था।

5. असुर विवाह (Asura marriage)




मनुस्मृति के अनुसार जिस विवाह में पुरुष कन्या के माता-पिता को यथाशक्ति धन देकर कन्या प्राप्त कर लेता था  असुर विवाह कहलाता था। यह एक प्रकार से कन्या की बिक्री थी समाज में आज भी ऐसे अल प्रचलित विवा देखने को मिलते हैं गरीबी की हालत में तो यह विवाह आम हो गया है। 

6. गांधर्व विवाह (gandhrva marriage)


यह यह एक प्रकार का प्रणय विवाह था, जिसमें माता-पिता की इच्छा के बिना ही वरकन्या एक दूसरे के गुणों पर आकर्षित होकर विवाह कर लेते थे मनु के अनुसार, जहां वर तथा कन्या स्वेच्छा से परस्पर मिलते हैं तथा कामवश उनमें मैथुन संबंध स्थापित हो जाता है वहां गांधर्व विवाह होता है क्योंकि इस प्रकार के विवाह का प्रचलन अधिकतर गंधर्व जाति में था इसलिए यह गांधर्व विवाह कहलाता था दुष्यंत एवं शकुंतला का विवाह इसी प्रकार का विवाह था भारत के कुछ भागों में अभी भी ऐसे समारोह का आयोजन किया जाता है जहां लड़की अपने लिए लड़के का चुनाव करती है और विवाह पूर्व शारीरिक संबंध बनाती है

7. राक्षस विवाह (Rakshas marriage)


मनुस्मृति के अनुसार कन्या पक्ष वालों की हत्या कर घायल कर उनके घरों को गिरा कर रोती बिलखती हुई कन्या को बलात उठा लाना तथा उसके साथ विवाह करना ही राक्षस विवाह कहलाता है इस प्रकार के विवाह में निहित क्रूरता एवं राक्षसी प्रवृत्तियों को देखते हुए ही इसे राक्षस विवाह कहा गया है। 

8. पेशाच विवाह (paishasa marriage)


इस विवाह की निरकष्टता को देखते हुए सभी शस्तकार इसकी कटु आलोचना करते है। इस प्रकार के विवाह में पुरुष अचेत, सोती हुई, पागल अथवा मदमस्त कन्या के साथ बलपूर्वक संभोग कर लेता था इसके पश्चात कन्या के सामने विवाह के अतिरिक्त अन्य कोई रास्ता नहीं होता था कन्या को समाज में उचित स्थान दिलाने के लिए समाज भी इस प्रकार के विवाह को वैधता परदान कर देता था सभी विद्वान इसे नितान्त असभ्य एवं बर्बर प्रथा बताते है संभवत: इसका पर्चलन आदिम जंगली जन जातियों में रहा होगा। वर्तमान में कभी कभी ऐसे मामले प्रकाश में आ जाते है जिसमे दुष्कर्म कर चुका व्यक्ति पीड़िता के साथ विवाह कर लेता है 


उक्त आठ प्रकार के विवाह के अतिरिक्त प्राचीन समय में प्रचलित अन्य प्रकार के विवाह निम्नानुसार थे

1. सवर्ण या अंतर्विवाह(Endogamy)

इनमें वैवाहिक संबंध एक समूह, एक गोत्र ,एक जाति या एक स्थान में बसने वालों के बीच होता था

2. अंतर्वर्ण या बहिर विवाह(Exogamy)

गोत्र अथवा जाति अथवा वर्ण के बहार विवाह अंतर्वर्ण विवाह कहलाता था प्राचीन धर्म शास्त्रों की मान्यता थी कि व्यक्ति को अपने ही वर्ण या जाति में विवाह करना चाहिए इससे अलौकिक यश की प्राप्ति होती है समान गोत्र में विवाह प्राय वर्जित था

3. अनुलोम विवाह(anuloma marriage)

अनुलोम विवाह में उच्च वर्ण का पुरुष अपने से ठीक नीचे वर्ण की कन्या से विवाह करता था वैदिक समाज में इस प्रकार के विवाह प्राय हुआ करते थे ब्राह्मण अगस्त्य ऋषि ने क्षत्रिय कन्या लोपामुद्रा से विवाह किया था शुंग शासक अग्निमित्र ने क्षत्रिय कन्या मालविका से विवाह किया था। 

4. प्रतिलोम विवाह(pratiloma marriage)

प्रतिलोम विवाह के अंतर्गत उच्च वर्ण की कन्या का विवाह निम्न वर्ण के पुरुष के साथ होता था इस प्रकार का विवाह उस समाज समाज में निंदनीय माना जाता था प्रतिलोम विवाह द्वारा उत्पन्न संतान को अस्पृश्य माना जाता था। 

5. बहुपत्नी विवाह(polygamy)

जब एक पुरुष कई स्त्रियों से विवाह करता था तो इसे बहू पत्नी विवाह कहा जाता था हर्यक वंश के सम्राट बिंबिसार एक मौर्य सम्राट अशोक के कई पत्नियां थी

6. बहुपति विवाह (polyandry)

जब एक स्त्री को ही पुरुषों से विवाह करती थी तो इसे बहुपति विवाह कहते थे यह प्रथम बहुत कम प्रचलित थी हिमालय क्षेत्र की कुछ जनजातियों में यह प्रथा प्रचलित थी महाभारत में द्रोपदी के पांच पति थे यद्यपि द्रोपदी ने यह विवाह नहीं किए थे अपीतु कुंती के कहने पर यह विवाह हुए थे प्राचीन समाज में इस प्रकार का विवाह निंदनीय माना जाता था


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