Sunday, December 11, 2022

आर सी मजूमदार (R.C.Majumdaar)

 .आर सी मजूमदार 

रमेशचंद्र मजूमदार का जन्म 4 दिसम्बर 1888 को जिला फरीदपुर (बांग्लादेश) में स्थित खंडपुरा नामक स्थान पर हुआ था उनके पिता हलधर मजूमदार थे प्रेसीडेंसी कॉलेज कोलकाता से उन्होंने इतिहास विषय में आनर्स के साथ स्नातक परीक्षा पास की। 1911 में प्रथम श्रेणी में इतिहास विषय में एम. ए. उत्तीर्ण किया। 1913 ई  में ढाका के गवर्नमेंट कॉलेज में परवक्ता पद पर नियुक्त हुए। 1914 ई में कलकत्ता विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में आ गए यही उन्होंने कारपोरेट लाइफ इन एसिएंट इंडिया पर PHD उपाधि प्राप्त की 1921 में ढाका विश्वविधालय में प्रोफेसर बने 1937 में ढाका विश्वविधालय के कुलपति बन गए। 1942 में यही से वे सेवनिवर्त हो गए। उन्होंने अपने सेवाकाल में ब्रिटेन, हॉलैंड, फ्रांस, जर्मनी, इटली, मिस्र एवम दक्षिण पूर्व एशियाई देशों की यात्रा की। यहां की सांस्कृतिक स्थिति का अध्ययन किया। 1950 ई में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में इंडोलॉजी विभाग के परचार्या नियुक्त हुए। 1951 ई में 23वी इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ ऑरिएंटलिस्ट के इंडोलॉजी विभाग की अध्यक्षता की। 

इतिहास लेखन एवम मूल्यांकन(Historiography and Evaluation)

भारत सरकार द्वारा 1953_54 ई में भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का इतिहास लेखन की परियोजना बनाई गई जिसका निर्देश आर सी मजूमदार द्वारा किया गया 1955_1959 तक मजूमदार जी ने नागपुर विश्वविधालय के प्राचीन इतिहास विभाग के प्रोफेसर पद पर कार्य ईकिया। संयुक्त राज्य अमेरिका के शिकागो एवम पेंसेलवानिया विश्वविधालयो में भारतीय इतिहास के विजिटिंग प्रोफेसर रहे आर सी मजूमदार की तो पूर्ण सर्व महत्वपूर्ण कृति 11 खंडों में लिखित हिस्ट्री एंड कल्चर ऑफ द इंडियन पिपुल है जो कि भारतीय विद्या भवन से प्रकाशित है कोलकाता के संस्कृत कॉलेज ने उन्हें 1955 ईस्वी में भारतव भास्कर की उपाधि से सम्मानित किया जाधवपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें 1967 में डी लिट की मानद उपाधि से सम्मानित किया 

आर सी मजूमदार ने इतिहास विषय की कई पुस्तकों का लेखन कार्य किया। इनमें Ensient india, दी वकाटक  गुप्त एज, हिस्ट्री ऑफ फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया आदि प्रमुख है उनका कहना था मेरी दृष्टि से सत्य केवल सत्य और पूर्ण सत्य ही इतिहास का लोहा ढांचा होना चाहिए इसके आधार पर इतिहास के विभिन्न विन्यास खड़े किए जा सकते हैं इतिहास में वे सत्यान्वेषण पर विशेष जोर देते थे उनकी ऐतिहासिक पद्धति वैज्ञानिक थी। उनका कहना था कि इतिहासकार को एक न्यायाधीश की तरह होना चाहिए। राष्ट्रीय चरित्र के किसी भी दोस्त को छुपाना नहीं चाहिए उनका कहना था कि शासन आधुनिक भारतीय इतिहासकारों को पद पर प्रतिष्ठा से आकर्षित कर रहा है जो इतिहास लेखन के लिए उचित नहीं है इस तरह के वस्तुनिष्ठ इतिहास पर विशेष जोर देते थे इतिहास में सत्यान्वेषण के लिए उन में अटूट आस्था थी वह जीवन भर अपने इसी सिद्धांत पर चलते-चलते 92 वर्ष की अवस्था में 1980 में इस दुनिया से इज्जत के साथ विदा हो गए


1 comment:

Anonymous said...

👏👏👏

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